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शयनकक्ष बनाते समय वास्तु का ध्यान रखें!-पं. दयानन्द शास्त्री

>> Monday, July 12, 2010


     शयन कक्ष का निर्माण वास्तु आधार पर करना चाहिए। शयन कक्ष का निर्माण एवं उसको व्यवस्थित करते समय वास्तु शास्त्र के नियमों का पालन करना चाहिए, जिससे भवन स्वामी और उसका परिवार सुखी रहे और गहन नींद का आनन्द ले सके जिससे अच्छे स्वास्थ्य के रहने पर कर्मक्षेत्र में पूर्ण क्षमता को प्रयोग कर सके।  किस दिशा में शयन कक्ष को बनाने से निम्न प्रभाव पड़ता है-
     पूर्व दिशा में शयन कक्ष शुभ नहीं माना जाता है। इस दिशा में शयन कक्ष बना हुआ हैं तो उसे अविवाहित बच्चों के लिए प्रयोग में ला सकते हैं। नवविवाहित/विवाहित दम्पत्ति के लिए यह दिशा वर्जित हैं। पूर्व दिशा देवराज इन्द्र की होती हैं तथा ग्रहों में सूर्य-ग्रह की दिशा होती हैं। बुजुर्गो एवं अविवाहित बच्चों के लिए शयन कक्ष के लिए प्रयोग में लाया जा सकता हैं। उत्तर-पूर्व (ईशान) दिशा में शयन कक्ष का निर्माण न करें तो श्रेष्ठ रहेगा। यह दिशा ग्रहों में बृहस्पति की दिशा मानी जाती है जोकि पूजा कक्ष या बच्चों के  अध्ययन/शयन हेतु प्रयोग में ले सकते हैं। विवाहित इस कक्ष में शयन करेंगे तो कन्या संतान अधिक होने की सम्भावना बनी रहती हैं। उत्तर दिशा में शयन कक्ष का निर्माण गृहस्वामी के लिए उपयुक्त हैं। अन्य सदस्यों के लिए भी शयनकक्ष श्रेष्ठ रहेगा। उत्तर पश्चिम दिशा में शयन कक्ष का निर्माण किया जा सकता हैं, यदि गृहस्वामी का व्यवसाय/सर्विस ऐसी होती हैं जिसमें अधिकतर टूर पर रहना होता हैं, उनके लिए वायव्य कोण में शयन कक्ष बनाना श्रेष्ठ रहेगा। यह कक्ष मेहमानों के ठहरने के लिए सर्वश्रेष्ठ है। जिन कन्याओं के विवाह में विलम्ब हो रहा हो, उन्हें इस दिशा के कक्ष में शयन करने से विवाह की सम्भावना प्रबल हो जाती हैं। पश्चिम दिशा में शयन कक्ष का निर्माण किया जा सकता हैं । दक्षिण-पश्चिम दिशा का कक्ष शयन के लिए सर्वोत्तम माना जाता हैं। गृहस्वामी के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। नैऋत्य कोण पृथ्वी तत्व हैं अर्थात स्थिरता का प्रतीक हैं। अतः इस कक्ष में गृहस्वामी का शयन कक्ष होने पर वह निरोगी एवं भवन में दीर्घकाल तक निवास करता हैं। दक्षिण दिशा में शयन कक्ष गृहस्वामी के लिए उपयुक्त माना गया हैं। गृहस्वामी के अतिरिक्त विवाहित दम्पत्तियों के लिए भी उपयुक्त कक्ष माना जाता हैं । दक्षिण पूर्व दिशा में शयन कक्ष को बनाना उचित नहीं माना गया हैं। यदि गृहस्वामी ऐसे कक्ष में शयन करता हैं तो वह अनिद्रा से ग्रस्त अथवा क्रोध आना, पूर्ण असन्तुष्टि मस्तिष्क में बनी रहना, जल्दबाजी में निर्णय लेकर, नुकसान उठाने पर पछतावा बना रहता है।

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