यह ब्‍लॉग आपके लिए है।

स्‍वागत् है!

आपका इस ब्‍लॉग पर स्‍वागत है! यह ब्‍लॉग ज्‍योतिष, वास्‍तु एवं गूढ वि़द्याओं को समर्पित है। इसमें आपकी रुचि है तो यह आपका अपना ब्‍लॉग है। ज्ञानवर्धन के साथ साथ टिप्‍पणी देना न भूलें, यही हमारे परिश्रम का प्रतिफल है। आपके विचारों एवं सुझावों का स्‍वागत है।

विवेकहीनता-हरिशंकर

>> Monday, August 16, 2010

    
एक धनी व्यक्ति ने हब्शी नौकर रखा। उसने पहले कभी हब्शी देखा नहीं था। उसका रंग कालास्याह था। धनी ने सोचा यह कभी नहाता नहीं होगा इसलिए मैल जम जाने से इसका रंग काला हो गया है। 
उसने बिना सोचे-समझे अपने अन्य नौकरों को आदेश दिया कि इसे अच्छी तरह रगड़-रगड़ कर तब तक नहलाओ जब तक यह स्वच्छ और श्वेत न हो जाए।
नौकरों ने मालिक की आज्ञा का पालन किया। विलम्ब तक साबुन रगड़ते रहने पर भी शरीर का रंग नहीं बदला। इतना अवश्य हो गया कि देर तक नहलाते रहने से वह हब्शी मालिक की विवेकहीनता का शिकार हो गया और बीमार होकर मर गया।
मानव जीवन में सत्य-असत्य के निर्णय का बहुत महत्त्व है। यदि मालिक ने सद् विवेक से निर्णय लिया होता तो वह हब्शी नहीं मरता।
     विवेकहीनता से बचना चाहिए अन्यथा हानि उठानी पड़ सकती है। विवेकी पुरुष ही सही निर्णय ले पाता है और कठिन परिस्थितियों से स्वयं को निकाल ले जाता है। 

2 comments:

ajit gupta August 16, 2010 at 12:09 PM  

विवेकहीन जीवन तो मृत्‍यु से भी बदतर है। अच्‍छा लेख है।

माधव August 16, 2010 at 12:59 PM  

nice

आगुन्‍तक

  © Blogger templates Palm by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP