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कर्मफल-शैलेन्द्र मिश्रा

>> Monday, July 19, 2010


एक ग्राम में मामचन्द नामक एक वैश्य रहता था। उसके  पत्नी और दो पुत्र अजय बड़ा और विजय छोटा था। अजय नास्तिक, दुष्ट, भोग-विलास, नीच कार्यों में लगा रहता था और सदैव माता-पिता को अपमानित करता था। इतने पर भी वह प्रसन्नता संग जीवन जी रहा था। जबकि अजय आस्तिक एवं सदैव माता-पिता संग घर और गाय की सेवा करता, किसी का दिल नहीं दुखाता, लेकिन फिर भी वह कठिनता से जीवन जी रहा था। यह सोचकर माता-पिता परेशान रहते कि अजय दुष्ट होते हुए सुखी और विजय अच्छा होते हुए भी दुःखी क्यों है? उनके ग्राम में एक महात्मा आए तो वे अपने दोनों पुत्रों के साथ उनसे मिलने चल दिए। रास्ते में अजय को ठोकर लगी वह गिर पड़ा और उठा तो उसके हाथ में सोने की गिन्नी थी जो उसे रास्ते में पड़ी मिली। थोड़ा आगे चलने पर विजय के पैर में कील चुभ गई जो आर-पार हो गई थी। खून रोकने के लिए पिता ने धोती फाड़कर पट्टी बांध दी। वे महात्मा जी की कुटिया में पहुंच गए वे ध्यान मग्न थे। आंखे खोली तो बोले-'क्या बात है, वत्स!' मामचन्द बोले-'मेरा बड़ा पुत्र दुष्ट होते हुए भी सुखी है और छोटा अच्छा होते हुए भी दुःखी, ऐसा क्यों है?' महात्मा हंस कर बोले-'बच्चा! यह कर्मफल है। अजय के पूर्वजन्म के कर्म बहुत अच्छे हैं जिस कारण उसे राजा बनना था। पर उसने उसे दुष्कर्मों से खो दिया। आखिरी लाभ उसे ठोकर लगकर गिन्नी मिली। विजय के पूर्व कर्म अत्यन्त खराब थे जिस वजह वे कष्ट व दुःख भोग रहा है। उसे फांसी पर चढ़ना था पर अच्छे कर्मों के कारण फांसी टल गई। कील चुभना उसका अन्तिम कष्ट था।  सुकर्म करते रहना चाहिए जिससे पूर्वजन्म के कुकर्मों का दण्ड कम हो जाता है।' 

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