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जपयोग-मन्त्रयोग सस्ता और सरल उपाय है!-राजीव शंकर माथुर

>> Tuesday, July 20, 2010


योग एक छोटा सा परन्तु स्वयं में गूढ़ अर्थों वाला शब्द है। योग के मुख्य अर्थ दो ही हैं-एक जोड़ना और दूसरा उपाय। साधक के मन का अन्तर्यामी के संग जुड़ना भी योग है अर्थात्‌ जिस -जिस उपाय से चित्त का स्वरूप के साथ संयोग होता है उसको योग ही कहते हैं। योग कई प्रकार का होता है-कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, हठयोग, नादयोग, लययोग और जपयोग इत्यादि। 
बन्ध मोक्ष
मन एव मनुष्याणां कारण बन्ध मोक्षयोः। चित्ते चलति संसारो निश्चते मोक्ष उचत्ये॥ उपरोक्त श्रुति का अर्थ है कि मनुष्य का मन ही मनेष्य के बंध ओर मोक्ष का कारण है। चित्त के चलाए संसार है और अचल किए मोक्ष है। मानव मन जब आसुरी सम्पत्ति से आसक्त होता है तब वह बन्धन का कारण होता है और जब वही मन दैवी सम्पत्ति युक्त हो जाता है तो मोक्ष का कारण होता है।
पूर्व वासना बल से चित्त चंचल होता है और वह संसार आत्म स्वरूप में विचित्र संसार का चित्रण करता है। साधक का मन जब तक चंचल रहता है तब तक सच्चे सुख को प्राप्त नहीं करता है। परन्तु जब चित्त स्वरूप में स्थिर हो जाता है तो निजानन्द प्राप्त होता है और वह कृतार्थ होता है। श्रुतियों में चित्त साधना के अनेक उपाय बताए गए हैं और उन्हीं के अनुसार अनुभवी महात्माओं ने अनेक साधनों का निर्माण करा है। जपयोग भी एक ऐसा ही शास्त्रोक्त और अनुभव सिद्ध साधन है।
वैदिक धर्म में जप योग
हमारे धर्म का मुख्य प्रमाण वेद है। इस विषय में कोई मतभेद नहीं है।  वैदिक धर्म का मुख्य लक्षण यज्ञ है। विभिन्न वर्णों के लिए भिन्न-भिन्न यज्ञों का वर्णन वेदों में मिलता है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के चौथे अध्याय के 33वें श्लोक में कहा है-श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप। अर्थात्‌ हे परन्तप अर्जुन! द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। गीता के अध्याय 10 के श्लोक 25 में श्रीकृष्ण ने जपयज्ञ और स्थिर रहनेवालों में हिमालय मैं हूँ।  जपयज्ञ को उन्होंने अपनी विभूति माना है। जपयज्ञ सबके लिए सुगम है। इसमें कोई खर्च नहीं और चाहे जब किया जा सकता है। इसी जपयज्ञ को जपयोग कहते हैं।
मनुस्मृति के अनुसार दर्शपोर्णमासरूप कर्म यज्ञों की अपेक्षा जपयज्ञ दसगुना श्रेष्ठ है। उपांशु जप सौ गुना और मानस जप हजार गुना श्रेष्ठ है। कर्मयज्ञ के चारों पाकयज्ञ वैश्वदेव, बलिकर्म, नित्य श्राद्ध और अतिथि पूजन  जपयज्ञ के सोलहवें अंश के बराबर भी नहीं है।
प्रणव और गायत्री मन्त्र जाप
महर्षि पंतजलि ने अपने योग सूत्रों में कहा है कि मुख्य है इसके अर्थ की भावना करते हुए जप करने से सिद्धि प्राप्त होती है। प्रणव वेदों का मूल मन्त्र है और सबने इसकी महिमा का गुणगान किया है। यह समस्त सिद्धियों को प्रदान करने वाला है।
पौराणिक मन्त्र जाप
इसके बाद विभिन्न देवताओं के मन्त्र आते हैं और आजकल विशेष रूप से प्रचलन में हैं। इसका कारण है कि इनका अर्थ आसानी से समझ आ जाता है ओर उच्चारण सरल है। नियमों की कड़ाई भी नहीं है। जब चाहे, जहां चाहे इनका जप किया जा सकता है।
उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मन्त्र जप या मन्त्र योग या जपयोग सर्वमान्य है। मन्त्र जप से सब सिद्धियां प्राप्त होती हैं और सर्वधर्म अनुष्ठानों का फल प्राप्त होता है। यह ऐसा साधन है जिसमें कोई कठिनाई नहीं है, कोई खर्च नहीं है और कठोर नियम भी नहीं हैं।

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