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अवचेतन मन को संयमित करने से जीवन निर्माण होता है!-डॉ. उमेश पुरी 'ज्ञानेश्वर'

>> Monday, August 2, 2010


मन  के  चेतन और अवचेतन स्तरों के मध्य सीमारेखा खींचना कठिन है। जिन अनुशासनों का पालन चेतन मन को संयमित करने के लिए करते हैं, वे अवचेतन मन को बिल्कुल अछूता कदापि नहीं छोड़ सकते। इसके विपरीत भी सत्य है। प्रायः चेतन मन के संयम की ही चर्चा की जाती है। अब अवचेतन मन के संयम की चर्चा करेंगे। अवचेतन मन का संयम चेतन स्तर पर किए गए कार्य का ही एक स्वाभाविक बढ़ाव है। हम सब जानते हैं कि क्या उचित है, फिर भी हम सब उसका पालन नहीं कर पाते, इसी प्रकार हम यह भी जानते हैं कि क्या अनुचित है, फिर भी हम सब उससे विरत नहीं हो पाते। जैसे रेत का घरौंदा ढह जाता है वैसे ही हमारे समस्त अच्छे संकल्प तुरन्त ढह जाते हैं और हम सब चकित भ्रमित और हताश से रह जाते हैं। दरअसल होता यह है कि हम चेतन मन से शुभ संकल्प करते हैं और अवचेतन मन से उनको नष्ट कर देते हैं। अवचेतन मन का अप्रकाशित भाग है।
जब हम गम्भीर होकर मन को संयमित करते हैं तो हमारे समक्ष कठिनाईयाँ बढ़ती जाती हैं और तब सोचने लगते है-''जबसे सुधरना शुरू किया है तब से और गिरावट व बाधाएँ आ रही हैं।'' किन्तु ऐसे में चिन्ता नहीं करनी चाहिए। यह सामान्य प्रक्रिया है और प्रत्येक सुधरने वाले के साथ ऐसा ही होता है।
जब हम चेतन मन को संयमित करने की चेष्टा करते हैं तो हमारी मुठभेड़ अवचेतन मन की विरोधी शक्तियों से होती है। ये विरोधी शक्तियां हमारे द्वारा संचित किए हुए संस्कार ही होते हैं। जो भी हम सोचते और करते हैं उसकी मोहर मन पर लग जाती है, तब अवचेतन मन से संस्कार ऊपर उठते हैं और अभिव्यक्त होने का प्रयास करते हैं। चेतन मन से उस समय हम जो सोच रहे होते हैं, उसके विरोधी यदि ये संस्कार होते हैं तो मुठभेड़ हो जाती है। जब तक अवचेतन मन के अशुभ संस्कारों या अन्धकार को प्रकाश से आलोकित नहीं करते तब तक इस मुठभेड़ से नहीं बच सकते।
अवचेतन मन को साफ करना स्याही की दवात को साफ करने की तरह है। जिस प्रकार स्याही की दवात को साफ करते समय हम उसमें साफ जल डालते हैं तो सूखी स्याही उसमें घुल जाती है और कुछ देर तक रंगीन जल ही बाहर निकलता है। साफ करते रहने पे धीरे-धीरे कम स्याही वाला जल बाहर आता है और अन्ततः स्याही का लेशमात्रा भी शेष नहीं रहता और दवात साफ हो जाती है। इसी प्रकार अवचेतन मन को साफ करने के लिए मन में पवित्रा विचारों का जल डालते हैं तो शुरू में अवचेतन मन में एकत्र स्याह संस्कारों का जल बाहर निकलता है, पर उससे भयभीत नहीं होना चाहिए। यदि हम पवित्रा विचार रूपी जल लगातार मन की दवात में डालते रहें तो एक समय ऐसा आयेगा जब पवित्रा विचार ही शेष रह जाएंगे। ऐसे में आप सोच सकते हैं कि अवचेतन मन साफ हो गया है और तब चेतन मन का संयम करना कठिन नहीं होगा।
अवचेतन मन से शुभाशुभ दोनों प्रकार के संस्कार संचित होते हैं। अतः मन को संयमित करते समय अवचेतन मन में सहायता और विरोध दोनों संचित होते हैं। सर्वप्रथम हमें विरोध को खत्म करना है। अतः मन के संयम के लिए महत्वपूर्ण कार्य अवचेतन पर करना होगा। चेतन और अचेतन मन का संयम हम तब तक  नहीं कर सकते जब तक जीवन का परमलक्ष्य अतिचेतन अवस्था की अनुभूति को न बनाएं। अतिचेतन अवस्था की अनुभूति अर्थात्‌ ईश्वर का साक्षात्कार ही हमारी आसक्ति, घृणा और भ्रम को दूर कर सकता है। 
यह जान लें कुत्सित कार्यों का समूह मन में जाग्रत क्षेत्रा अर्थात्‌ चेतन मन में रहता है, पर जिन कारणों ने इन कुत्सित कार्यों को जन्म दिया है, वे अवचेतन मन अर्थात्‌ प्रसुप्त क्षेत्रा के हैं और अधिक प्रभावशाली हैं।
चेतन मन ही अचेतन का कारण है। जो हमारे पुराने चेतन विचार और कार्य थे, वे ही घनीभूत होकर प्रसुप्त हो जाने पर अचेतन विचार बन जाते हैं। हमारा उनकी ओर ध्यान ही नहीं जाता क्योंकि तब हमें उनका ज्ञान नहीं रहता, हम उन्हें विस्मरण कर बैठते हैं। यह ध्यान रहना चाहिए कि यदि प्रसुप्त विचार अर्थात्‌ संस्कार में अशुभ करने की शक्ति है तो उनमें शुभ करने की भी शक्ति है। हमारे  अचेतन में विभिन्न प्रकार के विचार संस्कार रूप में प्रसुप्त हैं। इस तरह समझ लें कि मानों एक पाकेट में अनेक वस्तुएं पड़ी हैं जिन्हें हम भूल चुके हैं, उनका विचार तक नहीं है। यहा अचेतन और अवचेतन में अन्तर नहीं समझाया गया है। अचेतन या अवचेतन को अपने अधिकार में लाना हमारी साधना का प्रथम चरण है। दूसरे चरण में चेतन से परे जाना है। जिस प्रकार अचेतन व अवचेतन चेतन के नीचे (उसके पीछे) रहकर कार्य करता रहता है, उसी प्रकार चेतन के ऊपर भी एक अवस्था है अतिचेतन अवस्था। जब व्यक्ति इस अतिचेतन अवस्था में पहुंच जाता है तब वह मुक्त होता है और परमात्मा तत्त्व को प्राप्त करता है अर्थात्‌ उसका साक्षात्कार करता है। ऐसे में मृत्यु अमरत्व में परिणत हो जाती है।
अचेतन व अवचेतन को नियन्त्रिात करने के लिए प्राणायाम के द्वारा इड़ा और पिंगला के प्रवाहों को नियमित करना होगा। इसके साथ सत्य चेतन के परे जाने का मार्ग भी प्रशस्त करना होगा।
कहा गया है कि योगी वही है जिसने दीर्घकाल तक अभ्यास के द्वारा मन को वश में करके इस सत्य को पा लिया है-जब सुषुम्णा का द्वार खुल जाता है और इस मार्ग में वह प्रवाह प्रवेश करता है, जो इसके पूर्व उसमें कभी नहीं गया था, वह प्रवाह धीरे-धीरे विभिन्न कमल चक्रों में से होता हुआ उन्हें खिलाता हुआ अन्त में मस्तिष्क (ब्रह्मरन्ध्र) तक पहुंचता है तथा योगी को अपने सत्य स्वरूप का ज्ञान हो जाता है, वह जान लेता है कि वह स्वयं परमात्मा ही है।
    किसी भी रीति या साधन से मन को वश में करके परमात्मा में लगाना चाहिए। चंचल जल में अगर अपना प्रतिबिम्ब देखें तो वह विकृत दिखायी पड़ता है। उसी प्रकार चंचल चित्त में आत्मा का यथार्थ स्वरूप भी प्रतिबिम्बित नहीं होता है। वस्तुतः कहने का तात्पर्य यही है कि स्थिर मन में ही आत्मा का यथार्थ स्वरूप दिखायी पड़ता है। अतः मन को पूर्ण मनोयोग से स्थिर करने का प्रयत्न करना चाहिए। मन एकाग्र हो या स्थिर हो तो जीवन निर्माण में सहायता ही मिलती है। एकाग्र मन से किए गए कार्य या बनायी गई योजनाएं सफलता को प्राप्त होती हैं। अन्ततः मनुष्य वो सब पा लेता है जिसकी उसे स्वयं से उम्मीद होती है।

1 comments:

uthojago October 13, 2011 at 6:39 PM  

useful posts particularly i am working on subconscious mind

आगुन्‍तक

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